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क्यों मनाया जाता है ‘दीपों का त्योहार’ दिवाली? जानें इसके पीछे का पौराणिक महत्व और इतिहास 🪔✨

Diwali Special 2025 :भारत में जब कार्तिक अमावस्या की रात दीपों की जगमगाहट से धरती रोशन होती है, तो मानो अंधकार स्वयं ...

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| सतना टाइम्स

Diwali Special 2025 :भारत में जब कार्तिक अमावस्या की रात दीपों की जगमगाहट से धरती रोशन होती है, तो मानो अंधकार स्वयं पराजित होकर प्रकाश के आगे नतमस्तक हो जाता है। यही है दीपावली, जिसे प्रेमपूर्वक दिवाली कहा जाता है — भारत का सबसे बड़ा और लोकप्रिय त्योहार। यह पर्व केवल दीप जलाने का नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव है। हर साल यह पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है, जो भारतीय संस्कृति की आस्था, परंपरा और एकता का अद्भुत प्रतीक है।

भगवान राम की अयोध्या वापसी: दीपावली का आरंभ

दिवाली मनाने के पीछे सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीराम की है। रामायण के अनुसार, अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास पूर्ण किया और उस दौरान राक्षसराज रावण का वध कर धर्म की पुनः स्थापना की। जब वे माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तब नगरवासियों ने हर्ष और उत्साह से पूरा नगर दीपों से सजाया। हर गली, हर घर, हर छत पर घी के दीपक जलाए गए।

उस दिन अमावस्या की रात थी, परंतु हजारों दीपों की रोशनी से अयोध्या आलोकित हो उठी। लोगों ने मिठाइयां बांटीं, गीत गाए और नृत्य किया। तभी से यह दिन “दीपोत्सव” कहलाया और यह परंपरा आज तक जारी है। इस दिन दीप जलाने का अर्थ है — जीवन में अंधकार मिटाकर धर्म, सत्य और प्रेम का उजाला फैलाना।

माता लक्ष्मी का प्राकट्य: समृद्धि का प्रतीक

दिवाली का दूसरा महत्वपूर्ण पौराणिक प्रसंग समुद्र मंथन से जुड़ा है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों ने जब अमृत प्राप्ति के लिए सागर मंथन किया, तब कई दिव्य वस्तुएं निकलीं — उन्हीं में से एक थीं माता लक्ष्मी, जो धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं।

कहा जाता है कि उन्होंने कार्तिक अमावस्या की रात को प्रकट होकर भगवान विष्णु को अपना वर चुना। तभी से इस दिन लक्ष्मी पूजन की परंपरा शुरू हुई। लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, दीपक जलाते हैं और दरवाजों पर रंगोली और तोरण लगाते हैं ताकि माता लक्ष्मी प्रसन्न हों और घर में धन-धान्य की वृद्धि करें।

इस दिन व्यापारी अपने हिसाब-किताब की नई बही शुरू करते हैं और इसे शुभ मानते हैं। धार्मिक मान्यता है कि जहां स्वच्छता, प्रकाश और श्रद्धा होती है, वहीं माता लक्ष्मी का वास होता है।

भगवान कृष्ण और नरकासुर वध

दिवाली से एक दिन पहले, यानी नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली को एक और महत्वपूर्ण घटना से जोड़ा गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था।

नरकासुर ने पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था और हजारों कन्याओं को बंदी बना लिया था। श्रीकृष्ण ने उसे पराजित कर संसार को उसके अत्याचार से मुक्त कराया। उस विजय दिवस को “नरक चतुर्दशी” कहा गया और इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया। इसीलिए लोग इस दिन भी दीप जलाते हैं — ताकि जीवन से ‘नरक’ जैसे अंधकार का नाश हो सके।

जैन और सिख धर्म में दिवाली का महत्व

दिवाली का महत्व केवल हिंदू धर्म में ही नहीं, बल्कि जैन और सिख धर्म में भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

  • जैन धर्म में दिवाली का दिन भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया था। उनके अनुयायियों के लिए यह दिन आत्मा की शुद्धि और सत्य के प्रकाश का प्रतीक है।
  • सिख धर्म में यह दिन ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। छठे सिख गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद जी, को इस दिन ग्वालियर किले से कैद से मुक्त किया गया था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में इसी अवसर पर हजारों दीप जलाकर यह दिवस मनाया जाता है।

पांच दिवसीय दीपोत्सव का महत्व

दिवाली का त्योहार केवल एक दिन का नहीं होता, बल्कि पांच दिनों तक चलता है, और प्रत्येक दिन का अपना विशेष महत्व होता है:

दिन पर्व मुख्य महत्व
पहला दिन धनतेरस धन के देवता कुबेर और आयुर्वेद के देवता धन्वंतरि की पूजा; नए बर्तन, सोना, चांदी खरीदना शुभ।
दूसरा दिन छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध; यमराज के लिए दीपदान की परंपरा।
तीसरा दिन बड़ी दिवाली (लक्ष्मी पूजन) भगवान राम की अयोध्या वापसी; माता लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा।
चौथा दिन गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की स्मृति में अन्नकूट का आयोजन।
पांचवां दिन भाई दूज बहनें भाइयों की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

दिवाली का सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश

दिवाली केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और मानवता के बंधन को मजबूत करने वाला पर्व है। इस दिन लोग पुराने मतभेद भूलकर एक-दूसरे को मिठाइयाँ खिलाते हैं, घर सजाते हैं और खुशी बाँटते हैं।

दीपावली हमें यह सिखाती है कि जीवन में कितना भी अंधकार क्यों न हो, एक दीपक की लौ भी उसे मिटा सकती है। यह त्योहार आत्मा को उजाला देने, मन को शुद्ध करने और समाज में सद्भाव फैलाने का संदेश देता है।

संक्षेप में, दिवाली एक ऐसा पर्व है जो भक्ति, श्रद्धा और उत्साह का संगम है। यह हमें याद दिलाता है कि अच्छाई की राह कठिन हो सकती है, परंतु अंत में सत्य और प्रकाश की ही विजय होती है।

इसीलिए हर वर्ष जब दीपों की पंक्ति से धरती चमकती है, तो यह केवल रोशनी का उत्सव नहीं होता — यह मानवता के हृदय में आशा, विश्वास और नई शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें