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केन-बेतवा विस्थापितों की बड़ी जीत: छतरपुर में खत्म हुआ आंदोलन; अब फिर से होगा मुआवजे का सर्वे, कलेक्टर ने गठित कीं ‘स्पेशल टीमें’, 7 दिन में आएगी रिपोर्ट

छतरपुर। केन-बेतवा लिंक परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले 14 गांवों के ग्रामीणों के धैर्य और संघर्ष का फल मिल गया ...

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| सतना टाइम्स

छतरपुर। केन-बेतवा लिंक परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले 14 गांवों के ग्रामीणों के धैर्य और संघर्ष का फल मिल गया है। मुआवजे और पुनर्वास में धांधली की शिकायतों के बाद छतरपुर जिला प्रशासन ने री-सर्वे (दोबारा सर्वे) कराने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पात्र व्यक्ति का हक नहीं छिनने दिया जाएगा। प्रशासन के इस भरोसे के बाद आदिवासियों और किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है।

न्यूज़ हेडलाइंस 

  • एक्शन मोड: 14 प्रभावित गांवों में वेरिफिकेशन के लिए संयुक्त टीमें मैदान में उतरीं।

  • सख्त डेडलाइन: अगले 7 दिनों के भीतर रिपोर्ट और नए प्रस्ताव पेश करने के निर्देश।

  • ईमानदार कोशिश: स्थानीय कर्मचारियों के बजाय दूसरे क्षेत्रों के एसडीएम और तहसीलदारों को सौंपी गई जिम्मेदारी।

  • सत्यापन का आधार: वोटर लिस्ट, बीपीएल कार्ड, बिजली बिल और स्कूल रिकॉर्ड के जरिए होगी पात्रता की जांच।


प्रशासन की नई रणनीति: पारदर्शिता ही प्राथमिकता

मुआवजे की प्रक्रिया में पक्षपात के आरोपों को देखते हुए कलेक्टर ने एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया है।

  1. स्वतंत्र टीमें: जिन कर्मचारियों पर पहले आरोप लगे थे, उन्हें सर्वे से दूर रखा गया है। अब बिजावर सब-डिवीजन और अन्य तहसीलों के अधिकारी स्वतंत्र जांच करेंगे।

  2. कैंपेन मोड: री-सर्वे को एक अभियान की तरह चलाया जा रहा है ताकि पात्र लाभार्थियों के नाम सूची में जोड़े जा सकें और अपात्रों को हटाया जा सके।

  3. कलेक्टर का बयान: “हमारा लक्ष्य स्पष्ट है, पारदर्शिता ही हमारी प्राथमिकता है। किसी भी गरीब का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।”

प्रभावितों के लिए क्या बदलेगा? (सर्वे का मुख्य आधार)

विवरण प्रमुख जानकारी
कुल गांव 14 प्रभावित गांव
समय सीमा 7 कार्य दिवस (रिपोर्ट सबमिशन के लिए)
जांच के दस्तावेज वोटर लिस्ट, बीपीएल कार्ड, बिजली बिल, स्कूल रिकॉर्ड
टीम का गठन एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार और पटवारी
अतिरिक्त लाभ भूमिहीन परिवारों के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का समावेश

आंदोलनकारियों का रुख: “यह सिर्फ 10 दिन का स्थगन है”

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और आदिवासियों ने साफ कर दिया है कि वे प्रशासन की कार्रवाई पर पैनी नजर रखेंगे। अगर 7 से 10 दिनों के भीतर संतोषजनक परिणाम नहीं आए और जमीनी हकीकत नहीं बदली, तो वे एक बार फिर ‘जल सत्याग्रह’ और ‘चिता आंदोलन’ करने को विवश होंगे। फिलहाल, गांवों में टीमों के पहुँचने से ग्रामीणों में न्याय की उम्मीद जगी है।


खबर का सारांश 

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें

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