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एमपी ब्यूरोक्रेसी का ‘विलेज फोबिया’: साहबों को नहीं भा रहा ‘गाँव का बसेरा’; 90% कलेक्टर्स ने फेल किया CM का ‘नाइट स्टे’ प्लान, सुशासन के निर्देशों पर भारी पड़ी ‘अफसरी’

भोपाल। मध्य प्रदेश में सुशासन का सपना जमीनी हकीकत से कोसों दूर खड़ा नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव अनुराग ...

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| सतना टाइम्स

भोपाल। मध्य प्रदेश में सुशासन का सपना जमीनी हकीकत से कोसों दूर खड़ा नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव अनुराग जैन के सख्त निर्देशों के बावजूद प्रदेश के लगभग 90 प्रतिशत कलेक्टर और एसपी (SP) ने गाँवों में रात्रि विश्राम और चौपालों से दूरी बना रखी है। सरकार की मंशा थी कि अधिकारी गाँवों में रुकें और अंतिम छोर के व्यक्ति की समस्या का मौके पर समाधान करें, लेकिन ब्यूरोक्रेसी की इस ‘मनमानी’ ने जनसंवाद की पूरी पहल को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

न्यूज़ हेडलाइंस 

  • सुस्ती का आलम: सीएम-सीएस के आदेशों को ब्यूरोक्रेसी ने किया दरकिनार; गाँवों से दूरी बना रहे मैदानी अफसर।

  • सिर्फ फोटोबाजी: जो अधिकारी फील्ड में जा रहे, उनका ध्यान जनसमस्याओं के बजाय वीडियो और फोटो खिंचवाने तक सीमित।

  • सीधी से मिला सबक: जनता से दूरी बनाने वाले अधिकारियों पर गाज गिरना तय; पूर्व कलेक्टर पर हो चुकी है कार्रवाई।

  • फील्ड में सन्नाटा: जिला पंचायत और जनपद सीईओ भी ऑफिसों तक सीमित, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित।


फोटो-वीडियो का शौक, समाधान से परहेज

प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि कई अधिकारी फील्ड विजिट को केवल एक इवेंट’ की तरह ले रहे हैं। गाँवों में पहुँचने के बाद जनसमस्याओं के निराकरण से ज्यादा जोर इस बात पर होता है कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए अच्छे ‘शॉट्स’ मिल जाएं। सुशासन की इस पटरी से उतरती गाड़ी के बीच मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिए हैं कि जो जनता के बीच नहीं जाएगा, उसे फील्ड की जिम्मेदारी से हटा दिया जाएगा।

इन अधिकारियों ने पेश की ‘नजीर’ (सकारात्मक उदाहरण)

जहाँ एक ओर अधिकांश जिलों में सुस्ती है, वहीं कुछ कलेक्टर सक्रियता दिखाकर मिसाल कायम कर रहे हैं:

  1. रीवा: कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने जतरी गाँव पहुँचकर ग्रामीणों से सीधा संवाद किया।

  2. बड़वानी: कलेक्टर जयति सिंह ने कन्या आश्रम में रात गुजारकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया।

  3. सीधी और विदिशा: सीधी कलेक्टर विकास मिश्रा और विदिशा कलेक्टर अंशुल गुप्ता लगातार मैदानी स्तर पर सक्रिय हैं।

  4. टीकमगढ़ और निवाड़ी: विवेक श्रोत्रिय और जमुना भिड़े ने चौपाल लगाकर मौके पर ही पेंशन और पीडीएस जैसी समस्याओं को सुलझाया।


अंतिम छोर तक कैसे पहुँचेगा लाभ?

जब प्रशासनिक अमला गाँवों में रात नहीं रुकेगा और चौपाल नहीं लगाएगा, तो ग्रामीण अंचलों की वास्तविक चुनौतियों का पता चलना नामुमकिन है। सुदाम खाड़े और डॉ. सलोनी सिडाना जैसे अधिकारियों ने पूर्व में गाँवों में रहकर जो विश्वास जीता था, वह परंपरा अब धुंधली पड़ती जा रही है। अगर बाकी जिलों के कलेक्टरों ने भी यही रवैया अपनाया, तो सरकार की ‘जनसंवाद’ प्राथमिकता महज एक नारा बनकर रह जाएगी।


खबर का सारांश 

  • मुद्दा: अधिकारियों का गाँवों में रात्रि विश्राम और चौपाल से किनारा।

  • रिपोर्ट: प्रदेश के करीब 90% जिलों में निर्देशों की अनदेखी।

  • चेतावनी: जनता से दूरी बनाने वाले अफसरों पर सख्त कार्रवाई के संकेत।

  • उम्मीद: कुछ सक्रिय कलेक्टर्स के कारण सुशासन की उम्मीद बरकरार।


प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें