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EXCLUSIVE: भगोरिया ‘लव फेस्टिवल’ नहीं, बल्कि दुखों को भगाने और इंद्रदेव को रिझाने की पुकार है; जानें क्या है इसका असली इतिहास

झाबुआ, अलीराजपुर और धार समेत पूरे पश्चिमी मध्य प्रदेश में ‘भगोरिया’ की धूम शुरू हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं ...

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| सतना टाइम्स

झाबुआ, अलीराजपुर और धार समेत पूरे पश्चिमी मध्य प्रदेश में भगोरिया’ की धूम शुरू हो गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे दुनिया ‘लव फेस्टिवल’ या ‘शादी के लिए भागने वाला मेला’ समझती है, उसकी असल कहानी कुछ और ही है भोपाल स्थित जनजातीय संग्रहालय के विशेषज्ञों ने भगोरिया के इतिहास से जुड़े उन मिथकों को तोड़ा है, जो सालों से इसे गलत पहचान दे रहे थे।

MP Bhagoriya History

भोपाल। ढोल-मांदल की थाप, सिर पर साफा और हाथों में तीर-कमान… भगोरिया का नाम आते ही मन में एक उत्सव की तस्वीर उभरती है। लेकिन मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय के क्यूरेटर अशोक मिश्रा का कहना है कि भगोरिया को ‘प्रेम पर्व’ (Love Festival) कहना पूरी तरह गलत है। यह त्योहार असल में ‘दुख को भगाने’ का प्रतीक है।

क्यों पड़ा इसका नाम ‘भगोरिया’?

आम धारणा है कि यहां लड़का-लड़की एक-दूसरे को गुलाल लगाकर भाग जाते हैं और शादी कर लेते हैं, इसलिए इसे ‘भगोरिया’ कहते हैं। लेकिन अशोक मिश्रा के अनुसार:

  • इस फेस्टिवल का असली मकसद ‘दुख को भगाना’ (To drive away sorrows) था।

  • जीवन की समस्याओं और आपदाओं से मुक्ति पाने की भावना के कारण इसे ‘भगोरिया’ नाम मिला।

‘प्रेम पर्व’ नहीं, यह तो ‘इंद्रदेव का आह्वान’ है

मिश्रा ने बताया कि सदियों से यह त्योहार स्वदेशी आदिवासियों के एकजुट होने और इंद्रदेव से प्रार्थना करने का माध्यम रहा है।

 ब्रिटिश काल में भी था भीलों का पॉपुलर त्योहार

भगोरिया कोई नया आयोजन नहीं है। ब्रिटिश राज के दस्तावेजों में भी भीलों के इस प्रसिद्ध त्योहार का जिक्र मिलता है। यह वह समय होता है जब फसल कटाई के बाद आदिवासी समुदाय एक जगह इकट्ठा होकर मौज-मस्ती करता है, अपनों से मिलता है और आने वाली गर्मियों की मुश्किलों से लड़ने की शक्ति मांगता है।

संस्कृति का असली रंग

हाथ पकड़कर हिंडोले पर झूलना, एक-दूसरे को रंग लगाना और गले मिलना—यह सब प्रेम का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामुदायिक खुशी का हिस्सा है। जनजातीय संस्कृति में यह मेल-मिलाप आपसी भाईचारे को मजबूत करने के लिए होता है।

निष्कर्ष: भ्रम बनाम वास्तविकता

“भगोरिया कोई प्रेम पर्व नहीं, बल्कि एक आवाह्न पर्व है। यह सदियों से भीषण गर्मी में जीवित रहने और सूखे खेतों को पानी देने के लिए ईश्वर से की जाने वाली पुकार है।”

— अशोक मिश्रा, क्यूरेटर, MP जनजातीय संग्रहालय

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें

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