खंडवा (मध्य प्रदेश)। ओंकारेश्वर की पवित्र भूमि पर प्रस्तावित ममलेश्वर लोक निर्माण प्रोजेक्ट को लेकर चल रहे तीव्र आंदोलन ने आखिरकार सरकार और प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर दिया है। तीर्थनगरी में लगातार दो दिनों तक पूर्ण बंद (बंद) और जनजीवन ठप होने के बाद, जिला प्रशासन ने वर्तमान स्थल पर लोक निर्माण को तुरंत निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया है।
प्रशासन ने जारी किया आदेश: ‘विस्तार तुरंत निरस्त’
अपर कलेक्टर काशीराम बड़ोले द्वारा जारी आदेश में यह स्वीकार किया गया है कि “वर्तमान स्थल पर ममलेश्वर लोक का विस्तार तुरंत निरस्त किया जाता है।“ यह फैसला स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्रशासन की पूरी योजना जनसमर्थन, संवाद और संवेदनशीलता के बिना जबरन थोपने का प्रयास थी, जो जनता के प्रचंड विरोध के सामने विफल हो गई।
प्रशासन की विफलता: रात के अंधेरे में सर्वे के आरोप
ब्रह्मपुरी क्षेत्र के स्थानीय निवासियों ने प्रशासन पर कठोर आरोप लगाए हैं:
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गुप्त सर्वे: दिनभर खुलेआम विरोध होने के बावजूद प्रशासन ने रात के अंधेरे में चोरी-छिपे सर्वे करवाया।
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संवाद की कमी: जनता की भावनाओं को रौंदते हुए घरों और दुकानों पर खतरे मंडराए, लेकिन प्रशासन ने किसी भी स्तर पर संवाद की पहल नहीं की।
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स्थानीय लोगों ने प्रशासन के इस रवैये को “थोपने वाली तानाशाही” जैसा बताया, जिसके खिलाफ उन्हें सड़क पर उतरना पड़ा।
दो दिन तक हाहाकार: श्रद्धालु हुए बेहाल
सरकार और प्रशासन की अव्यवस्था के कारण दूसरे दिन भी ओंकारेश्वर पूरी तरह से बंद रहा।
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मूल सुविधाएं ठप: होटल, ढाबे, चाय-नाश्ते, ऑटो-नाव सेवा, और यहां तक कि दवा की दुकानें भी बंद रहीं।
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श्रद्धालु परेशान: बुजुर्गों को 2-3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। महिलाएँ और बच्चे भी परेशानी में रहे।
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जनता का आक्रोश: श्रद्धालुओं ने सरकार की ओर उंगली उठाते हुए कहा, “हम भगवान के दर्शन आए थे, प्रशासन ने हमें सड़क पर रुला दिया।” तीर्थनगरी जैसी जगह में मूलभूत सुविधाओं का इस तरह से ठप होना सरकार और जिला प्रशासन की सीधी नाकामी का प्रमाण है।
जनता की एकजुटता से सरकार झुकी
जिस प्रोजेक्ट को ‘विकास’ के नाम पर जनता पर थोपा जा रहा था, उसे जनता के प्रचंड विरोध ने दो दिन में ही निकम्मा साबित कर दिया।
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प्रशासनिक हार: अपर कलेक्टर का आदेश स्वयं यह बताता है कि स्थल चयन गलत था, और प्रक्रिया जनविरोधी थी।
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नया स्थान तय होगा: आदेश में यह स्पष्ट घोषणा की गई है कि अब नया स्थान जनभावनाओं के अनुसार तय किया जाएगा।
ओंकारेश्वर आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि “बिना जनमत, बिना संवाद और बिना सम्मान के किया गया कोई भी विकास… विनाश साबित होता है।” जनता की दृढ़ता ने अंततः प्रशासन को अपनी गंभीर चूक और जनभावनाओं की अनदेखी के लिए झुकने पर मजबूर कर दिया।








