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असीरगढ़ का अनसुलझा रहस्य: बंद दरवाजों के पीछे कौन चढ़ा जाता है महादेव पर फूल? क्या आज भी असीरगढ़ के जंगलों में भटक रहे हैं अश्वत्थामा?

बुरहानपुर। सतपुड़ा की दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित असीरगढ़ का किला इतिहासकारों के लिए जितना महत्वपूर्ण है, श्रद्धालुओं के लिए उतना ही रहस्यमयी। ...

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| सतना टाइम्स

बुरहानपुर। सतपुड़ा की दुर्गम पहाड़ियों पर स्थित असीरगढ़ का किला इतिहासकारों के लिए जितना महत्वपूर्ण है, श्रद्धालुओं के लिए उतना ही रहस्यमयी। इस किले के भीतर एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसे गुप्तेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी पहेली यह है कि किले के भारी-भरकम दरवाजे रात भर बंद रहने के बावजूद, सुबह जब पट खुलते हैं, तो शिवलिंग पर ताजे फूल और चंदन अर्पित मिलता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, यह पूजा कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा करते हैं।

न्यूज़ हेडलाइंस 

  • अदृश्य उपासक: रात के सन्नाटे में बंद किले के भीतर कौन करता है भगवान भोले का श्रृंगार?

  • महाभारत का संबंध: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण के श्राप के कारण अमरत्व का दंड भोग रहे हैं अश्वत्थामा।

  • चमत्कार या आस्था: सुबह 11 बजे किला खुलने से पहले ही शिवलिंग पर मिल जाते हैं ताजे फूल।

  • ऐतिहासिक धरोहर: 14वीं शताब्दी में अहीर राजा आसा द्वारा निर्मित यह किला रहा है कई साम्राज्यों का गवाह।


अश्वत्थामा और असीरगढ़ का कनेक्शन

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था, जिसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक घावों के साथ भटकने का श्राप दिया था।

  1. किले की गुफाएं: कहा जाता है कि अश्वत्थामा किले के पास बने एक तालाब में स्नान करते हैं और फिर गुप्त रास्ते से मंदिर पहुँचकर शिव की आराधना करते हैं।

  2. बुजुर्गों के दावे: गांव के बुजुर्ग आज भी ऐसी कहानियां सुनाते हैं कि उन्होंने एक अति-विशालकाय आकृति को अंधेरे में मंदिर की ओर जाते देखा है। कुछ लोग तो यहाँ तक दावा करते हैं कि अश्वत्थामा आज भी अपने माथे के घाव के लिए तेल और हल्दी की मांग करते हुए दिखाई देते हैं।

बंद दरवाजों का रहस्य

असीरगढ़ किले की सुरक्षा व्यवस्था काफी सख्त है।


इतिहास और वास्तुकला का संगम

रहस्यों से इतर, असीरगढ़ किला सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है:

  • अहीर राजा की देन: इसका निर्माण अहीर राजा आसा ने करवाया था।

  • विजेताओं का लक्ष्य: मुगलों, मराठों और अंग्रेजों, सभी ने इस किले पर अधिकार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, क्योंकि इसे जीते बिना दक्षिण भारत पर विजय पाना असंभव माना जाता था।


श्रद्धा का सैलाब

आज यह मंदिर केवल एक पहेली नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। महाशिवरात्रि के पर्व पर यहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लोग इस उम्मीद में यहाँ आते हैं कि शायद उन्हें उस महान योद्धा की झलक मिल जाए, जो सदियों से महादेव की शरण में है। आस्था रखने वालों के लिए यह एक साक्षात चमत्कार है, तो जिज्ञासुओं के लिए एक ऐसी पहेली, जिसका उत्तर शायद असीरगढ़ की इन खामोश दीवारों के पास ही छिपा है।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें

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