ग्वालियर, मध्य प्रदेश: दीपोत्सव से ठीक एक दिन पहले, नरक चतुर्दशी के अवसर पर, मध्यप्रदेश का ग्वालियर शहर एक अत्यंत दुर्लभ धार्मिक परंपरा का केंद्र बन जाता है। यहाँ देश का इकलौता यमराज का मंदिर स्थित है, जिसकी स्थापना लगभग 275 साल पहले सिंधिया राजवंश द्वारा की गई थी।
फूल बाग में स्थित है तांत्रिक महत्व का मंदिर
यमराज, जिन्हें मृत्यु के देवता और लोगों के प्राण हरण करने वाले के रूप में जाना जाता है, का यह अनूठा मंदिर ग्वालियर शहर के बीचों-बीच फूल बाग इलाके में स्थित मारकंडेश्वर मंदिर परिसर में मौजूद है। मंदिर के पुजारी पंडित मनोज भार्गव के अनुसार, यमराज की इस प्रतिमा की स्थापना सिंधिया वंश के राजाओं ने की थी। इसका तांत्रिक महत्व होने के कारण यह न केवल ग्वालियर-चंबल अंचल, बल्कि देश भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।
नरक चतुर्दशी पर विशेष पूजा का विधान
यमराज की विशेष पूजा और अभिषेक हर साल दीपावली से ठीक एक दिन पहले यानी नरक चतुर्दशी (नरक चौदस) के मौके पर किया जाता है।
पौराणिक कथा: पंडित भार्गव बताते हैं कि नरक चौदस पर यमराज की पूजा करने का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने यमराज की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि नरक चौदस पर जो भी उनकी पूजा-अर्चना करेगा, उसकी आत्मा को कम से कम यातनाएँ सहनी होंगी और अंत में उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। इसी मान्यता के कारण इस दिन यमराज को प्रसन्न किया जाता है।
चांदी के चौमुखी दीपक से आरती
नरक चौदस पर यमराज की पूजा-अर्चना खास तरीके से की जाती है। सबसे पहले यमराज की प्रतिमा का घी, तेल, पंचामृत, इत्र, फूल माला, दूध, दही और शहद आदि से अनेक बार अभिषेक किया जाता है। इसके बाद स्तुति गान और पूजा के उपरांत दीप दान किया जाता है। इस अवसर पर चांदी के चौमुखी दीपक से यमराज की विशेष आरती उतारी जाती है।
देश भर से भक्त इस अनूठे मंदिर में पूजा करने के लिए ग्वालियर पहुँचते हैं, यह विश्वास रखते हुए कि यमराज की स्तुति से उनकी मनोकामनाएँ पूरी होंगी और उन्हें सांसारिक कर्मों से मुक्ति के बाद कम यातनाएं सहनी पड़ेंगी।








