भोपाल। मध्य प्रदेश में चुनावी सरगर्मियों के बीच कांग्रेस ने एक बड़ा दांव खेला है। प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित कांग्रेस कार्यालय (PCC) में शुक्रवार को मालवा क्षेत्र के सुसनेर के प्रसिद्ध कथावाचक मोहित नागर ने विधिवत कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उन्हें पार्टी का पटका पहनाकर ‘हाथ’ का साथ देने का संकल्प दिलाया। इस दौरान आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सियासत और आध्यात्म का अनोखा संगम देखने को मिला।

न्यूज़ हेडलाइंस (Highlights):
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कथावाचक का ‘सियासी’ वाचन: सुसनेर के लोकप्रिय कथावाचक मोहित नागर अब कांग्रेस के पाले में।
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निशाने पर सरकार: सदस्यता लेते ही आदिवासियों के मुद्दे पर प्रदेश सरकार को घेरा।
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अंधेरे में वार: पीसीसी में बिजली गुल होने पर जीतू पटवारी ने सरकार को जमकर कोसा।
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धार्मिक संदर्भ: “मां शबरी को भी प्रभु राम का इंतजार करना पड़ा था” — मोहित नागर।
कौन हैं मोहित नागर?
आगर मालवा जिले की सुसनेर विधानसभा के रहने वाले मोहित नागर क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित कथावाचक हैं। वे अपनी संगीतमय श्रीमद्भागवत और रामकथा के लिए जाने जाते हैं। सोशल मीडिया पर उनके भजनों और कथाओं के वीडियो खासे लोकप्रिय हैं। विशेष रूप से आदिवासी अंचलों में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है; उन्होंने दावा किया कि वे अब तक 10 से 15 हजार आदिवासियों को दीक्षा दे चुके हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘पावर कट’ पर सियासत
दिलचस्प मोड़ तब आया जब प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अचानक बिजली गुल हो गई। इसे मुद्दा बनाते हुए जीतू पटवारी ने सरकार पर तीखा तंज कसा:
“ये हैं प्रदेश के हालात! दावा 24 घंटे बिजली का है, लेकिन हकीकत आपके सामने है। सरकार लाडली बहनों को 1500 रुपये देती है और बिजली का बिल 3000 रुपये थमा देती है।”
— जीतू पटवारी, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस
आदिवासी कार्ड और शबरी का जिक्र
कांग्रेस में शामिल होते ही मोहित नागर ने आदिवासियों को सनातन का सच्चा अनुयायी बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि जिस तरह मां शबरी ने भगवान राम का लंबा इंतजार किया था, उसी तरह की स्थिति आज भी देखने को मिल रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे आदिवासी क्षेत्रों में अपनी कथाओं के माध्यम से जनसेवा और जागरूकता का कार्य जारी रखेंगे।
सियासी मायने
विशेषज्ञों का मानना है कि मोहित नागर के कांग्रेस में आने से मालवा और आगर मालवा क्षेत्र में पार्टी को धार्मिक और सामाजिक स्तर पर मजबूती मिल सकती है। खासकर आदिवासी मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता का लाभ कांग्रेस आगामी चुनावों में उठाने की कोशिश करेगी।








