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MP के टाइगर रिजर्व में ‘स्पेस’ की कमी: जनवरी 2025 से अब तक 79 बाघों की मौत; वन विभाग ने देहरादून के WII से माँगी वैज्ञानिक मदद

भोपाल | मध्य प्रदेश में बाघों का संरक्षण अब एक नए और चुनौतीपूर्ण दौर में पहुँच गया है। जहाँ पहले लक्ष्य बाघों ...

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| सतना टाइम्स

भोपाल | मध्य प्रदेश में बाघों का संरक्षण अब एक नए और चुनौतीपूर्ण दौर में पहुँच गया है। जहाँ पहले लक्ष्य बाघों की संख्या बढ़ाना था, वहीं अब चुनौती यह है कि हमारे जंगल आखिर कितने बाघों को सुरक्षित रख सकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 16 महीनों (जनवरी 2025 से अब तक) में 79 बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें से अधिकांश की वजह आपसी संघर्ष (इलाके की लड़ाई) बताई जा रही है। इस संकट से निपटने के लिए वन विभाग ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) से ‘धारण क्षमता’ (Carrying Capacity) के आकलन के लिए संपर्क किया है।

मुख्य बिंदु 

  • भीषण टकराव: बाघों की बढ़ती संख्या के कारण कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच जैसे नेशनल पार्कों में इलाके को लेकर संघर्ष बढ़ा है।

  • WII की मदद: देहरादून स्थित संस्थान अब वैज्ञानिक मापदंड तैयार करेगा कि किस पार्क में कितने बाघों का रहना सुरक्षित है।

  • सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: कोर्ट ने चेतावनी दी है कि बाघों का कम होना या बहुत ज्यादा होना, दोनों ही पारिस्थितिक तंत्र के लिए जोखिम भरे हैं।

  • इंसानी बस्तियों में दस्तक: मुख्य क्षेत्रों (Core Areas) में जगह कम होने के कारण बाघ अब बफर जोन और गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।


क्यों मर रहे हैं ‘जंगल के राजा’?

वन विभाग के प्रमुख सुभरंजन सेन के अनुसार, बाघों की मौत का सबसे बड़ा कारण आपसी लड़ाई है।

  1. सीमित सीमाएं: नेशनल पार्कों की भौगोलिक सीमाएं सीमित हैं, जबकि बाघों की आबादी लगातार बढ़ रही है।

  2. गलियारों का कटना: पारंपरिक वन्यजीव गलियारे (Corridors) कटने की वजह से युवा बाघ नए इलाकों की तलाश में भटक रहे हैं और आबादी वाले क्षेत्रों में घुस रहे हैं।

  3. शिकार का अभाव: कई क्षेत्रों में शिकार (Prey Base) की कमी के कारण भी बाघों के बीच तनाव बढ़ा है।

वैज्ञानिक मापदंडों की दरकार

भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व डीन वाई.वी. झाला की रिपोर्ट इशारा करती है कि कुछ अभ्यारण्य अपनी क्षमता के करीब हैं, जबकि कुछ में अभी भी गुंजाइश है। अब चुनौती इन बाघों को कम घनत्व वाले क्षेत्रों में ‘री-लोकेट’ करने और उनके प्राकृतिक गलियारों को बहाल करने की है।


अगला कदम: वैज्ञानिक प्रबंधन

वन विभाग अब ‘साइंटिफिक मापदंडों’ के आधार पर यह तय करेगा कि:

  • किस नेशनल पार्क में बाघों का घनत्व कम करने की जरूरत है।

  • क्या बाघों को अन्य सुरक्षित अभ्यारण्यों में स्थानांतरित (Translocate) किया जाना चाहिए।

  • मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए बफर जोन में सुरक्षा के क्या उपाय हों।


खबर का सारांश 

  • बाघों की कुल आबादी (अनुमानित): 1000+

  • कुल मौतें (जनवरी 2025 से): 79 बाघ।

  • सबसे प्रभावित पार्क: कान्हा, बांधवगढ़, पेंच।

  • मुख्य कारण: आपसी संघर्ष और टेरिटरी की कमी।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें