भोपाल (मध्य प्रदेश): राजधानी भोपाल के अंकुर मैदान पर सोमवार से ‘महर्षि मैत्री मैच शृंखला-6’ का भव्य आगाज़ हुआ है। यहाँ क्रिकेट का खेल किसी जर्सी या ट्रैकसूट में नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक वेशभूषा धोती-कुर्ते में खेला जा रहा है। माथे पर तिलक और त्रिपुंड लगाए खिलाड़ी जब मैदान पर दौड़ते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई प्राचीन गुरुकुल आधुनिक खेल के मैदान में उतर आया हो।
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देववाणी संस्कृत में गूँज रही कमेंट्री
इस टूर्नामेंट की सबसे बड़ी यूएसपी इसकी कमेंट्री है। जहाँ आमतौर पर क्रिकेट में अंग्रेजी या हिंदी का बोलबाला रहता है, वहीं यहाँ हर गेंद और रन का हिसाब संस्कृत में दिया जा रहा है। क्रिकेट की शब्दावली को भी बेहद खूबसूरती से संस्कृत में ढाला गया है:
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बल्ला: वल्लकः
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गेंद: कन्दुकम्
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पिच: क्षिप्या
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रन: धावनम्
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चौका: चतुष्कम्
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छक्का: षठकम्
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अंपायर: निर्णायक
देशभर से आए ‘वैदिक’ खिलाड़ी
वैदिक ब्राह्मण युवा खेल कल्याण समिति और परशुराम कल्याण बोर्ड द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता का यह छठा वर्ष है। इसमें मध्य प्रदेश सहित देशभर की 27 टीमें हिस्सा ले रही हैं। खिलाड़ी न केवल मैदान पर संस्कृत में कमेंट्री सुन रहे हैं, बल्कि आपस में बातचीत और चर्चा भी संस्कृत भाषा में ही कर रहे हैं।
पुरस्कार में ‘गीता’ और ‘मानस’
इस आयोजन का उद्देश्य केवल खेल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण है। यही कारण है कि पुरस्कारों का चयन भी उसी गरिमा के अनुरूप किया गया है:
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उपहार: ‘मैन ऑफ द मैच’ और ‘मैन ऑफ द सीरीज’ बनने वाले खिलाड़ियों को श्रीमद्भागवत गीता और श्रीरामचरित मानस भेंट की जाएगी।
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मुख्य अतिथि: 9 जनवरी को होने वाले समापन समारोह में बागेश्वरधाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे और विजेताओं को पुरस्कृत करेंगे।
काशी की तर्ज पर भोपाल का प्रयोग
काशी (वाराणसी) में होने वाले पारंपरिक क्रिकेट की तर्ज पर शुरू हुआ भोपाल का यह प्रयोग अब काफी लोकप्रिय हो रहा है। परशुराम कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष विष्णु राजोरिया के अनुसार, यह आयोजन युवाओं को अपनी जड़ों और संस्कृत भाषा से जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम है।








