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डिंडौरी में शिक्षा का ‘वनवास’: ना छत, ना दीवार, सिर्फ़ आसमान! 500 स्कूल भवन टूटे, पेड़ के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर मासूम

डिंडौरी (मध्य प्रदेश): ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ का नारा मध्यप्रदेश के आदिवासी जिला डिंडौरी में बेअसर साबित हो रहा है। यहाँ ...

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| सतना टाइम्स

डिंडौरी (मध्य प्रदेश): ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ का नारा मध्यप्रदेश के आदिवासी जिला डिंडौरी में बेअसर साबित हो रहा है। यहाँ शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से भगवान भरोसे है। जिले में 500 से अधिक स्कूलों के भवन जर्जर होकर ढह चुके हैं या तोड़ दिए गए हैं, लेकिन बच्चों के बैठने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। आलम यह है कि बच्चे कड़ाके की ठंड और खुले आसमान के नीचे पेड़ की छांव में क ख ग सीखने को मजबूर हैं।

केस स्टडी: मेंहदवानी का नेटी टोला प्राथमिक स्कूल

जिले के मेंहदवानी विकासखंड अंतर्गत नेटी टोला की प्राथमिक शाला सिस्टम की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है:

  • भवन विहीन स्कूल: एक साल पहले यहाँ के पुराने स्कूल भवन को जर्जर बताकर तोड़ दिया गया (डिस्मेंटल)।

  • भगवान भरोसे पढ़ाई: भवन टूटने के बाद यहाँ के 37 बच्चों के पास बैठने के लिए कोई कमरा नहीं है। बच्चे कभी किसी की झोपड़ी में बैठते हैं, तो कभी पेड़ के नीचे।

  • सिस्टम पर तंज कसती घड़ी: वायरल वीडियो में पेड़ की टहनी पर टंगी एक पुरानी घड़ी दिखाई दे रही है, जो समय तो बता रही है, लेकिन प्रशासन की सुस्ती पर सवाल खड़े कर रही है।

500 स्कूलों का भविष्य अधर में

शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, डिंडौरी जिले में 500 से अधिक सरकारी स्कूल या तो जर्जर घोषित हो चुके हैं या उन्हें तोड़ दिया गया है। सवाल यह उठता है कि जब भवन तोड़े गए, तो नए भवनों का निर्माण या किराए के कमरों की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

ग्रामीणों में आक्रोश, अधिकारियों के गोलमोल जवाब

जब मीडिया की टीम मौके पर पहुँची, तो ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। ग्रामीणों का कहना है:

“हमने पंचायत से लेकर जिला प्रशासन तक कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। क्या हमारे बच्चों को पढ़ने का हक नहीं है?”

वहीं, इलाके के बीआरसी (BRC) का दावा है कि वैकल्पिक व्यवस्था की गई है, जबकि मौके पर बच्चे जमीन पर बैठे नजर आए। जिला कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने अब मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द ही व्यवस्था दुरुस्त करने का आश्वासन दिया है।

निष्कर्ष

आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा की ऐसी स्थिति सरकार के ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘आधुनिक शिक्षा’ के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। जहाँ एक ओर करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च हो रहे हैं, वहीं 37 मासूमों के पास बैठने के लिए एक पक्का कमरा तक नहीं है।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें

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