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‘यात्रियों का विकास, हमारा विनाश’: ट्रॉली बैग और एस्केलेटर ने छीना कुलियों का काम; सतना के 42 परिवारों के सामने आजीविका का संकट

सतना (मध्य प्रदेश):लाल शर्ट, कंधे पर पीतल का बिल्ला और सिर पर सामान ढोने का संकल्प— रेलवे स्टेशन की यह पहचान अब ...

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| सतना टाइम्स

सतना (मध्य प्रदेश):लाल शर्ट, कंधे पर पीतल का बिल्ला और सिर पर सामान ढोने का संकल्प— रेलवे स्टेशन की यह पहचान अब धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही है। सतना रेलवे स्टेशन पर काम करने वाले 42 कुली परिवार आज आधुनिकता की मार झेल रहे हैं। ट्रेन के रुकते ही ‘साहब… कुली!’ पुकारने वाली आवाजें अब कम सुनाई देती हैं, क्योंकि यात्रियों के हाथों में अब लोहे के भारी ट्रंक नहीं, बल्कि चक्के वाले ‘ट्रॉली बैग’ हैं।

ट्रॉली बैग और लिफ्ट बने सबसे बड़े दुश्मन

सतना स्टेशन पर 15 वर्षों से काम कर रहे चंदन यादव बताते हैं कि तकनीक ने उनकी कमर तोड़ दी है।

  • ट्रॉली बैग: पहले भारी अटैचियों के लिए कुली अनिवार्य थे, लेकिन अब बच्चे भी अपना बैग खुद खींच लेते हैं।

  • एस्केलेटर और लिफ्ट: प्लेटफॉर्म पर लगी ऑटोमैटिक सीढ़ियों और लिफ्ट ने कुलियों की जरूरत को खत्म कर दिया है।

  • दूरी का कम होना: सतना के प्लेटफॉर्म नंबर 1 से निकास द्वार की दूरी कम होने के कारण यात्री खुद ही सामान लेकर निकल जाते हैं।

100-200 रुपये में कैसे पलेगा परिवार?

कभी दिन के 500-700 रुपये कमाने वाले कुलियों की आय अब सिमटकर 100-200 रुपये रह गई है। रेलवे ने 40 किलो वजन के लिए 60 रुपये का रेट तय किया है, लेकिन मुश्किल रेट की नहीं, बल्कि काम (सवारी) मिलने की है। बढ़ती महंगाई के दौर में इतनी कम कमाई से बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाना नामुमकिन होता जा रहा है।

“रेलवे यात्रियों को देख रहा, हमें नहीं”

कुली उमेश कुमार शर्मा का कहना है कि स्टेशन पर बैटरी कार और निजीकरण जैसी सुविधाओं ने उन्हें बेकार कर दिया है। वे कहते हैं, “यात्रियों के लिए जो विकास है, वह हमारे लिए विनाश साबित हो रहा है। रेलवे ने यात्रियों की सुविधाएं तो बढ़ा दीं, लेकिन हमारे पेट पर लात मार दी।”

लालू यादव जैसा ‘मसीहा’ चाहती है नई पीढ़ी

सतना के कुली आज भी साल 2008 के उस दौर को याद करते हैं जब तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कुलियों को ‘गैंगमैन’ बनाकर ग्रुप-डी में शामिल किया था।


निष्कर्ष: भारतीय रेलवे की इस जीवंत विरासत को बचाने के लिए सामाजिक और प्रशासनिक सहयोग की आवश्यकता है, ताकि विकास की इस दौड़ में कोई पीछे न छूट जाए।


प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें

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