सतना, मध्य प्रदेश: सतना जिले के वन परिक्षेत्र सिंहपुर में वन विभाग द्वारा 25 हेक्टेयर वनभूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने की बड़ी कार्रवाई ने प्रशासन की दोहरी नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस कार्रवाई में एक ओर जहाँ गरीब आदिवासी और मजदूर वर्ग के वर्षों पुराने आशियाने जेसीबी से मिटा दिए गए, वहीं दूसरी ओर इन्हीं जंगलों की सैकड़ों एकड़ भूमि तथाकथित बाबाओं और धार्मिक संस्थाओं को ‘कानूनी’ रूप से दी जा रही है।
गरीबों पर चला बुलडोजर
शनिवार को हुई इस कार्रवाई में वन विभाग की टीम ने बीट शिवराजपुर और मोरा के कुल 25 हेक्टेयर क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराया। जिन परिवारों के घर और खेती की जमीन छीनी गई, वे अधिकतर आदिवासी और मजदूर वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि “गरीबों पर बुलडोज़र चलता है, लेकिन बाबाओं और प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जे पर विभाग आँखें मूँद लेता है।”
कार्रवाई के बाद ये गरीब परिवार अब बेघर और बेसहारा हो गए हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और रोष का माहौल है।
‘बाबा और पट्टा संस्कृति’ पर उठे सवाल
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वन विभाग पर दोहरे मापदंड अपनाने का गंभीर आरोप लगाया है। सूत्रों के अनुसार, इसी वन परिक्षेत्र में कुछ धार्मिक संस्थाओं और आश्रमों को सामुदायिक उपयोग के नाम पर 100 से अधिक एकड़ वनभूमि का पट्टा (कानूनी कब्जा) दिया गया है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक तरफ वन संरक्षण के नाम पर उन आदिवासी परिवारों को हटाया जा रहा है जो वर्षों से छोटी झोपड़ियाँ बनाकर जीवन-यापन कर रहे थे, और दूसरी तरफ उन्हीं की जमीन पर प्रभावशाली लोगों और बाबाओं को वनभूमि पर ‘कानूनी कब्जा’ दिया जा रहा है।
कार्रवाई का ब्योरा
वन परिक्षेत्राधिकारी नितेश कुमार गंगेले के नेतृत्व में हुई कार्रवाई में निम्नलिखित अतिक्रमण हटाए गए:
- मोरा बीट (कक्ष क्र. पी-253): 17.00 हेक्टेयर भूमि, जिसमें जगलाल गोंड और रामू गोंड जैसे आदिवासी परिवारों का कब्जा शामिल था।
- शिवराजपुर बीट (कक्ष क्र. पी-265): 8.00 हेक्टेयर भूमि।
वन विभाग ने बताया कि भूमि को भविष्य में अतिक्रमण से बचाने के लिए गहरी खुदाई कर सुरक्षित किया गया है।








