इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई मौतों की जांच कर रहे एक सदस्यीय न्यायिक आयोग ने साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को और विस्तार दिया है। अब पीड़ित परिवार, चश्मदीद या संस्थाएं इस त्रासदी से जुड़े कोई भी दस्तावेज, फोटो या वीडियो 1 अप्रैल 2026 तक आयोग के समक्ष पेश कर सकते हैं। पहले इसकी अंतिम तिथि 28 फरवरी तय की गई थी।

क्यों बढ़ाई गई तारीख?
अधिकारियों के अनुसार, कई नागरिक संगठनों और पीड़ित परिवारों ने आयोग से समय बढ़ाने का अनुरोध किया था। उनका तर्क था कि त्रासदी के व्यापक प्रभाव और तकनीकी दस्तावेजों को जुटाने में अधिक समय लग रहा है। आयोग ने पारदर्शिता और अधिक से अधिक तथ्यात्मक सामग्री जमा करने के उद्देश्य से इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया है।
कौन कर रहा है जांच?
इस संवेदनशील मामले की कमान मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुशील कुमार गुप्ता के हाथों में है।
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जांच के मुख्य बिंदु: पेयजल दूषित होने का तकनीकी कारण, प्रशासनिक लापरवाही, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान और भविष्य के लिए सुधारात्मक उपाय।
आप क्या-क्या जमा कर सकते हैं?
आयोग ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति निम्नलिखित सामग्री साक्ष्य के तौर पर दे सकता है:
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मेडिकल रिकॉर्ड: बीमार पड़ने वाले मरीजों के चिकित्सीय दस्तावेज।
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मृत्यु प्रमाण पत्र: त्रासदी के दौरान हुई मौतों से संबंधित पेपर।
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विजुअल प्रूफ: पाइपलाइन में लीकेज या सीवरेज मिलने के फोटो और वीडियो।
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प्रशासनिक दस्तावेज: जलापूर्ति कार्यों की निविदा (Tenders), वर्क ऑर्डर और पुरानी निरीक्षण रिपोर्ट।
त्रासदी का संक्षिप्त इतिहास
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शुरुआत: दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में।
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प्रभाव: भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से उल्टी-दस्त का भीषण प्रकोप फैला।
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विवाद: कांग्रेस और स्थानीय लोगों ने 36 मौतों का दावा किया था, जबकि 19 फरवरी को विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने आधिकारिक तौर पर 22 मौतों की पुष्टि की।
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मुआवजा: सरकार ने प्रत्येक मृतक के परिजन को 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया है।








