भोपाल: भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ितों को राहत देने के लिए 2010 में घोषित ₹272.75 करोड़ की पुनर्वास योजना आज सवालों के घेरे में है। सरकारी दस्तावेजों और ज़मीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आया है। योजना के तहत आवंटित राशि में से ₹139 करोड़ आज भी सरकारी तिजोरी में बिना खर्च के पड़े हैं, जबकि जो राशि खर्च हुई है, वह भी या तो अधूरे निर्माण या अनुपयोगी उपकरणों पर बर्बाद हो गई है।

मेडिकल पुनर्वास: अस्पताल खाली, उपकरण धूल फांक रहे
पुनर्वास योजना में मेडिकल सुविधाओं के लिए ₹33.55 करोड़ आवंटित किए गए थे, लेकिन हालात निराशाजनक हैं:
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उपकरण बेकार: अस्पतालों के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी और टीएमटी जैसी करोड़ों की मशीनें खरीदी गईं, लेकिन वे धूल फांक रही हैं।
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डॉक्टरों की कमी: गैस राहत अस्पतालों में 90% विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं, और 40 से 50% मेडिकल ऑफिसर ही उपलब्ध हैं।
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मॉड्यूलर OT की बर्बादी: करोड़ों रुपये खर्च करके तीन अस्पतालों में मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर (OT) बनाए गए, लेकिन एक भी बड़ी सर्जरी नहीं हुई है, क्योंकि यहाँ एनेस्थीसिया विशेषज्ञ और सर्जन नहीं हैं। इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल के अधिकारियों ने खुद लिखा है कि OT आज तक चालू नहीं हुआ।
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अधूरे ICU: शाकिर अली खान अस्पताल और जेएन अस्पताल जैसे संस्थानों में सेंट्रल ऑक्सीजन लाइन तो लगाई गई, लेकिन वहाँ आईसीयू (ICU) ही नहीं है, जिससे मरीजों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।

सामाजिक पुनर्वास: योग केंद्र बने शादी घर और गोदाम
सामाजिक पुनर्वास के लिए भी आवंटित धनराशि का सही उपयोग नहीं हुआ है:
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योग केंद्र विफल: ₹3.63 करोड़ की लागत से सात योग केंद्र बनाए गए थे, जिसका उद्देश्य गैस पीड़ितों को शारीरिक राहत देना था। लेकिन एक भी योग प्रशिक्षक नियुक्त नहीं हुआ। नतीजतन, कई केंद्र आज शादी घर या गोदाम के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं।
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सीवर व्यवस्था ठप: करोंद की विधवा कॉलोनी में सीवेज सिस्टम के लिए 2014 में ₹5 करोड़ की मंजूरी मिली थी, लेकिन आज भी नालियाँ काम नहीं करतीं और बरसात में सीवर का पानी घरों में भर जाता है।

आर्थिक पुनर्वास: ₹18 करोड़ में 94% भुगतान फ़र्ज़ी
आर्थिक पुनर्वास की तस्वीर सबसे अधिक चिंताजनक है:
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फ़र्ज़ी प्रशिक्षण: 2011 से 2013 के बीच 22 एजेंसियों को प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए ₹18.13 करोड़ का भुगतान किया गया। आरटीआई दस्तावेजों से पता चला है कि लगभग 25% नाम फ़र्ज़ी थे, आधे से ज्यादा जॉब ऑफर लेटर नकली थे, और करीब 94% भुगतान धोखाधड़ी में चला गया।
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पर्यावरण के दावे झूठे: सरकार ने ₹50 करोड़ खर्च कर साफ पानी उपलब्ध कराने का दावा किया, जबकि सर्वे बताते हैं कि 80% इलाकों में आज भी सीवर मिला हुआ पानी आ रहा है, क्योंकि सीवर ट्रीटमेंट प्लांट कभी बना ही नहीं।
पीड़ितों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग
सरकारी वार्षिक रिपोर्टों में इन सभी योजनाओं को सफल बताया जा रहा है, जबकि ज़मीनी हकीकत और विभागीय पत्र इस दावे को झुठलाते हैं।
गैस पीड़ितों के चार प्रमुख संगठनों (जिसमें रशिदा बी, नसरीन बी, बलकृष्ण नामदेव, और रचना डिंगरा शामिल हैं) ने मुख्यमंत्री से तत्काल उच्चस्तरीय जांच और राज्य सलाहकार समिति की बैठक बुलाने की मांग की है। संगठनों का आरोप है कि विभाग राहत नहीं दे रहा, बल्कि पीड़ितों की बदकिस्मती का फायदा उठाकर वर्षों से ठेकेदारों और अधिकारियों को फायदा पहुंचा रहा है।
निष्कर्ष: 272 करोड़ का यह पुनर्वास प्लान उन इमारतों की तरह है जो बाहर से नई हैं, पर अंदर से खोखली हैं। 40 साल बाद भी, गैस पीड़ित उस सिस्टम के भरोसे हैं जो उन पर खर्च हुए पैसे से सिर्फ इमारतें खड़ी कर लेता है, पर उनकी ज़िंदगी नहीं बदलता।








