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REPORT: खाली दौड़ रही भोपाल मेट्रो; 800 की क्षमता और सवारियां सिर्फ 100, जानें क्यों फ्लॉप हो रहा है राजधानी का यह ड्रीम प्रोजेक्ट

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को लेकर जो शुरुआती उत्साह था, वह अब ठंडे बस्ते में जाता दिख ...

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| सतना टाइम्स

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को लेकर जो शुरुआती उत्साह था, वह अब ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। उद्घाटन के समय उमड़ी भीड़ को नियमित यात्री समझने की भूल प्रबंधन पर भारी पड़ रही है। आज स्थिति यह है कि कई स्टेशनों पर सन्नाटा पसरा है और ट्रेनें बिना यात्रियों के फेरे लगा रही हैं।

आंकड़ों में मेट्रो की गिरावट

  • दिसंबर 2025: उद्घाटन के समय जबरदस्त भीड़, लोग ‘शौकिया’ सफर के लिए उमड़ रहे थे।

  • मार्च 2026: 800 यात्रियों की क्षमता वाली ट्रेन में अब बमुश्किल 100 पैसेंजर भी नहीं मिल पा रहे हैं।

  • फेरों में कटौती: शुरुआती रुझान देखकर प्रबंधन ने 17 फेरे तय किए थे, जिन्हें अब घटाकर 13 कर दिया गया है।

क्यों नहीं मिल रहे पैसेंजर? (प्रमुख कारण)

मेट्रो के खाली रहने के पीछे कई तकनीकी और व्यावहारिक कारण सामने आए हैं:

  • सीमित रूट: पहले चरण में मेट्रो केवल सुभाषनगर से AIIMS (साकेत नगर) तक चल रही है। यह महज 7 से 7.5 किमी की दूरी है, जो दैनिक यात्रियों के लिए पर्याप्त कनेक्टिविटी नहीं देती।

  • पार्किंग का संकट: मुख्य स्टेशनों पर व्यवस्थित और सुरक्षित पार्किंग की भारी कमी है। लोग अपनी गाड़ी असुरक्षित छोड़ कर मेट्रो में बैठना पसंद नहीं कर रहे।

  • असुविधा और अवैध कब्जा: दिव्यांगों के लिए आरक्षित पार्किंग पर अवैध कब्जे और स्टेशनों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी यात्रियों को निराश कर रही है।

  • असुरक्षा का भाव: यात्रियों ने फीडबैक में असुरक्षा और असुविधा के अहसास की बात कही है।

व्यावसायिक हब बनाने की योजना को झटका

मेट्रो स्टेशनों को ‘कमर्शियल हब’ बनाकर कमाई करने की योजना भी अधर में लटकती दिख रही है। स्टेशनों पर यात्रियों की कम आवाजाही के कारण निवेशक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स और दुकानों में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इससे प्रोजेक्ट की वित्तीय स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

भोपाल मेट्रो: एक नजर में

विवरण आंकड़े
शुरुआत 21 दिसंबर 2025
कुल स्टेशन 8
रूट सुभाषनगर से AIIMS साकेत नगर
यात्री क्षमता 800 (प्रति ट्रेन)
वर्तमान स्थिति 17 से घटकर 13 फेरे

प्रबंधन की चुनौती

अब मेट्रो प्रबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों को ‘शौकिया यात्री’ से ‘नियमित यात्री’ (Routine Passenger) में बदलने की है। जब तक रूट का विस्तार नहीं होता और पार्किंग जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, तब तक मेट्रो का घाटा कम होना मुश्किल लग रहा है।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें