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LEGACY: ग्वालियर के ‘महाराजा’ माधवराव सिंधिया क्यों नहीं बन पाए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री? 2 बार हाथ से फिसली सत्ता की चाबी

ग्वालियर। 10 मार्च 1945 को जन्मे माधवराव सिंधिया के पास वह सब कुछ था जो एक आदर्श राजनेता के पास होना चाहिए— ...

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| सतना टाइम्स

ग्वालियर। 10 मार्च 1945 को जन्मे माधवराव सिंधिया के पास वह सब कुछ था जो एक आदर्श राजनेता के पास होना चाहिए— राजसी आभा, अटूट लोकप्रियता और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का भरोसा। इसके बावजूद, मध्य प्रदेश की सियासत के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले नेताओं की बिसात ने उन्हें कभी भोपाल के ‘श्यामला हिल्स’ (मुख्यमंत्री निवास) तक नहीं पहुँचने दिया।

1989: शपथ की तैयारी थी, पर बाजी पलट गई

वह दौर था जब मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ‘चुरहट लॉटरी कांड’ के आरोपों से घिरे थे।

  • राजीव गांधी की पसंद: राजीव गांधी चाहते थे कि माधवराव सिंधिया मध्य प्रदेश की कमान संभालें।

  • ऐन वक्त पर उलटफेर: सिंधिया दिल्ली से भोपाल पहुँच चुके थे, समर्थक जश्न की तैयारी में थे। लेकिन अर्जुन सिंह और उनके गुट की घेराबंदी ने आलाकमान को मजबूर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सिंधिया की जगह मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया।

1993: ‘शिष्य’ ने रोक दिया ‘महाराजा’ का रास्ता

1993 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद एक बार फिर सिंधिया का नाम सबसे ऊपर था।

  • अर्जुन सिंह की चाल: अर्जुन सिंह ने खुद रेस से बाहर रहकर अपने शिष्य दिग्विजय सिंह का नाम आगे बढ़ा दिया। रातों-रात समीकरण बदले और माधवराव सिंधिया एक बार फिर बहुमत के आंकड़ों और गुटीय राजनीति के कारण मुख्यमंत्री बनने से चूक गए।

राजमाता से रिश्तों में कड़वाहट और वसीयत का विवाद

माधवराव सिंधिया का राजनीतिक सफर पारिवारिक संघर्षों की छाया में भी रहा।

  • सिद्धांतों की लड़ाई: 1979 में जब माधवराव ने जनसंघ छोड़ कांग्रेस का हाथ थामा, तो उनकी माँ राजमाता विजयाराजे सिंधिया इतनी आहत हुईं कि उनके बीच बातचीत बंद हो गई।

  • वसीयत का दर्द: राजमाता ने अपनी वसीयत में यहाँ तक लिख दिया था कि माधवराव उनकी संपत्ति के हकदार नहीं होंगे। हालांकि, 2001 में माँ के निधन पर माधवराव ने ही पुत्र का धर्म निभाते हुए उन्हें मुखाग्नि दी थी।

1977 की ‘जनता लहर’ में निर्दलीय जीत का कीर्तिमान

माधवराव सिंधिया की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1977 में जब कांग्रेस और इंदिरा गांधी विरोधी लहर में बड़े-बड़े दिग्गज ढह गए थे, तब सिंधिया ने ग्वालियर से निर्दलीय चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की। वे उस समय निर्दलीय जीतने वाले इकलौते उम्मीदवार थे।

माधवराव सिंधिया: एक नज़र में

  1. जन्म: 10 मार्च 1945।

  2. रिकॉर्ड: 9 बार लोकसभा चुनाव जीते (कभी चुनाव नहीं हारे)।

  3. कद: केंद्र में रेल, विमानन और मानव संसाधन विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाला।

  4. विरासत: ग्वालियर-चंबल अंचल में आज भी ‘महल’ का प्रभाव इन्हीं की लोकप्रियता की नींव पर टिका है।

प्रांशु विश्वकर्मा, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर है।जो बिजनेश और नौकरी राजनीति जैसे तमाम खबरे लिखते है।... और पढ़ें