MP News :प्रदेश के किसानों के लिए खरीफ सीजन इस बार खाद संकट लेकर आया है। अलग-अलग जिलों से लगातार खबरें आ रही हैं कि किसान यूरिया की तलाश में लंबी कतारों में खड़े हो रहे हैं, कई जगह खाली हाथ लौटना पड़ रहा है तो कहीं गुस्साए किसान सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर प्रदेश में सचमुच खाद की कमी है या वितरण व्यवस्था में गड़बड़ी?

सोयाबीन घटी, मक्का-धान के रकबे बढ़े
विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार खरीफ सीजन में मक्का का रकबा 5 लाख हेक्टेयर बढ़कर 20.8 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि बीते साल यह 15.3 लाख हेक्टेयर था। धान की बोवनी भी मामूली बढ़कर 36.32 लाख हेक्टेयर तक पहुंची है। दूसरी ओर, सोयाबीन की खेती में कमी आई है। इस बार यह 51.20 लाख हेक्टेयर में बोई गई है, जबकि पिछले वर्ष 53.85 लाख हेक्टेयर थी।चूंकि सोयाबीन की तुलना में मक्का में यूरिया की खपत कई गुना ज्यादा होती है, इसलिए मांग अचानक बढ़ गई। यही वजह है कि खाद की कमी ने किसानों को परेशान कर दिया है।
मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर
कृषि विभाग के मुताबिक, प्रदेश में इस साल यूरिया की मांग करीब 1 लाख मीट्रिक टन बढ़ गई है। सितंबर में ही 4 लाख मीट्रिक टन यूरिया की जरूरत बताई गई, लेकिन 6 सितंबर तक सिर्फ 60 हजार मीट्रिक टन ही मिल पाया। यानी करीब साढ़े 3 लाख मीट्रिक टन की कमी दर्ज की गई। अधिकारियों का दावा है कि अगले 24-25 दिनों में जरूरत के मुताबिक आपूर्ति कर दी जाएगी, लेकिन तब तक किसानों की मुश्किलें जस की तस बनी रहेंगी।
वितरण प्रणाली पर उठे सवाल
प्रदेश में खाद वितरण का जिम्मा केंद्र से आवंटन मिलने के बाद अलग-अलग संस्थाओं को दिया जाता है।
- 30% यूरिया निजी दुकानदारों को जाता है।
- शेष 70% में से आधा सहकारी समितियों को और आधा मार्कफेड व एमपी एग्रो को डबल लॉक व्यवस्था के तहत मिलता है।
जिलों में इनके सेंटरों पर रोजाना हजारों किसान कतार में खड़े रहते हैं। कई बार आपूर्ति कम होती है तो कई बार वितरण व्यवस्था में खामियों की वजह से तनाव की स्थिति बन जाती है।
विरोध और टकराव की नौबत
खाद संकट की वजह से प्रदेश के कई हिस्सों में किसान आंदोलन कर चुके हैं। भिंड में तो हालात इतने बिगड़े कि विधायक और कलेक्टर के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। किसानों का कहना है कि उन्हें समय पर खाद नहीं मिल रहा, जबकि बोवनी और फसलों की बढ़वार के लिए यह बेहद जरूरी है।
सरकार की चुनौती
प्रदेश सरकार और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि खाद की आपूर्ति और वितरण को समय पर सुनिश्चित किया जाए। कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि हर बार सितंबर-अक्टूबर में यह समस्या गहराती है, लेकिन इस बार मांग बढ़ने से हालात और बिगड़ गए हैं।







